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स्पेशल वाली फीलिंग

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  स्पेशल वाली फीलिंग भूमिका मानव जीवन में कुछ भाव ऐसे होते हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते, बल्कि स्मृतियों में और अधिक उजले होकर उभरते हैं। बचपन उन्हीं भावों का सबसे सुंदर अध्याय है, जहाँ छोटी-छोटी खुशियाँ भी जीवन को असाधारण बना देती थीं। उस समय “स्पेशल” होने का अर्थ किसी बड़ी उपलब्धि से नहीं, बल्कि किसी साधारण वस्तु या अनुभव से जुड़ी निष्कलुष प्रसन्नता से था। यही मासूम अहसास आज के जटिल और समझदार जीवन में कहीं खो सा गया है। प्रस्तुत रचना उसी बचपन की “स्पेशल वाली फीलिंग” को संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त करती है। फीलिंग विवरण बचपन के दिन भी क्या दिन थे—उड़ते-फिरते तितली बन के। सच है, समय तितली की तरह ही उड़ जाता है, मगर उसके पंख इतने मजबूत होते हैं कि हम चाहकर भी उसे पकड़ नहीं सकते। हाँ, उसके खूबसूरत रंगों को देखकर खुश ज़रूर हो सकते हैं। समय के सबसे खूबसूरत रंग की बात करें, तो वह है—बचपन। मस्त, हरफ़नमौला, अगले पल से बेखबर, आज में जीते हुए। समझदार होने पर वे पल नहीं मिलते। सच पूछो, तो ज़िंदगी का असली मज़ा बच्चों की तरह भोला और मासूम बनकर ही लिया जा सकता है। समझदारी तकल...