स्पेशल वाली फीलिंग
स्पेशल वाली फीलिंग
भूमिका
मानव जीवन में कुछ भाव ऐसे होते हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते, बल्कि स्मृतियों में और अधिक उजले होकर उभरते हैं। बचपन उन्हीं भावों का सबसे सुंदर अध्याय है, जहाँ छोटी-छोटी खुशियाँ भी जीवन को असाधारण बना देती थीं। उस समय “स्पेशल” होने का अर्थ किसी बड़ी उपलब्धि से नहीं, बल्कि किसी साधारण वस्तु या अनुभव से जुड़ी निष्कलुष प्रसन्नता से था। यही मासूम अहसास आज के जटिल और समझदार जीवन में कहीं खो सा गया है। प्रस्तुत रचना उसी बचपन की “स्पेशल वाली फीलिंग” को संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त करती है।
फीलिंग विवरण
बचपन के दिन भी क्या दिन थे—उड़ते-फिरते तितली बन के। सच है, समय तितली की तरह ही उड़ जाता है, मगर उसके पंख इतने मजबूत होते हैं कि हम चाहकर भी उसे पकड़ नहीं सकते। हाँ, उसके खूबसूरत रंगों को देखकर खुश ज़रूर हो सकते हैं। समय के सबसे खूबसूरत रंग की बात करें, तो वह है—बचपन। मस्त, हरफ़नमौला, अगले पल से बेखबर, आज में जीते हुए। समझदार होने पर वे पल नहीं मिलते। सच पूछो, तो ज़िंदगी का असली मज़ा बच्चों की तरह भोला और मासूम बनकर ही लिया जा सकता है। समझदारी तकलीफ़ और चिंता बढ़ा देती है, लेकिन ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए समझदार होना भी पड़ता है।
बचपन की कुछ फीलिंग बेहद खास होती है—वही बताने जा रही हूँ। पहले संयुक्त परिवार होते थे और उनमें कहीं कोई दिखावा नहीं होता था। जब हम छोटे थे, तो हमने हमेशा काला मंजन और लाल मंजन का ही इस्तेमाल किया था, वह भी उँगली से। कभी-कभी दातून भी कर लिया करते थे। किंतु जब किसी को ब्रश से कोलगेट पेस्ट करते हुए देखती, तो मेरा मन भी मचल उठता था। मैं सोचती थी कि जो लोग यह इस्तेमाल करते हैं, वे बहुत खास होते हैं; उनके पास बहुत पैसा होता है।
जब पहली बार ट्रेन में मैंने कोलगेट पेस्ट का इस्तेमाल किया, तो मन में बहुत ही “स्पेशल वाली फीलिंग” आई। मैंने इधर-उधर नज़र घुमाकर देखा—कि मुझे कौन-कौन देख रहा है।
ठीक ऐसे ही, जब घर में हमारी ज़िद पर पहली बार परदे लगे, तो बार-बार उन्हें छूना, इधर-उधर सरकाना—सब कुछ एक उत्सव जैसा लगता था। पर्दों को देखकर बहुत सारी फिल्मों के सीन याद आ जाते थे—तेज़ हवा का चलना, पर्दों का लहराना। सच, बड़ा ही प्राउड फील होता था कि हमारे यहाँ भी अब परदे हैं।
आज यह बात मायने नहीं रखती, पर तब बहुत अहमियत रखती थी, क्योंकि हमारी बहुत ज़िद के बाद घर में परदे लगे थे। हम इस इंतज़ार में रहते थे कि अब कोई आए और हम उसे अपने परदे दिखाएँ। परदे तो आज भी हैं—पर दिखावे के, बेईमानी के, झूठ के। न जाने कितने परदे लहरा रहे हैं, जिनमें अब कोई रंग नहीं, मस्ती वाली लहर नहीं—बस परदे ही रह गए हैं।
उसी तरह, घर में टीवी का आना किसी त्योहार से कम नहीं होता था। जिनके यहाँ हम जाकर टीवी देखा करते थे, उन्हें बड़े सम्मान के साथ अपने यहाँ बुलाकर टीवी से परिचय कराया जाता था। उस समय भी वही “स्पेशल वाली फीलिंग” होती थी, जिसमें घमंड कहीं नहीं था—बस एक बच्चे की तरह कुछ मिल जाने की खुशी, जो सबको बताकर ही पूरी होती थी।
मुझे याद है, एक बार हमारे यहाँ हमारी मौसी आई थीं—अपनी बड़ी, चमचमाती सफेद एंबेसडर लेकर। जब उनके साथ मैं पहली बार उसमें बैठी, तो न जाने कितनी बार मैंने पलटकर इधर-उधर देखा… वजह वही—“स्पेशल वाली फीलिंग”… कि किस-किस ने मुझे देखा।
सच, यह “स्पेशल वाली फीलिंग” बचपन में ही क्यों आती है? बड़े होने पर, स्पेशल हो जाने पर भी, क्यों वह खुशी नहीं मिल पाती?
बस… इतना ही।
सृजक
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