ये प्रेम नहीं तो क्या है?
ये प्रेम नहीं तो क्या है?
भूमिका
प्रेम… एक ऐसा भाव, जो शब्दों में समेटा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। प्रेम की यही अनिर्वचनीयता जब अभिव्यक्ति का रूप लेती है, तो वह कविता बन जाती है—और जब वह आत्मा की गहराइयों से निकलती है, तो वह सीधे हृदय को स्पर्श करती है।
प्रमिला त्रिवेदी की प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी अंतर्मन की सच्ची पुकार हैं। यहाँ प्रेम कोई आडंबर नहीं, कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि जीवन का एक गहन सत्य है—एक ऐसी आवश्यकता, जो व्यक्ति के अस्तित्व को पूर्णता देती है। “तुम प्रेम प्रणय की मूरत हो…” कहकर कवयित्री ने प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य धुरी के रूप में स्थापित किया है।
इन पंक्तियों में एक ओर आत्मविश्वास से भरा स्त्री-स्वर है, तो दूसरी ओर समर्पण की मधुर ध्वनि भी। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि प्रेम का संतुलन है—जहाँ स्वाभिमान भी है और अपनापन भी। “तुम हो प्रेम पथिक तो मैं भी…” जैसी पंक्तियाँ इस बात को स्पष्ट करती हैं कि यह प्रेम किसी एक का नहीं, बल्कि दो आत्माओं के समानांतर प्रवाह का नाम है।
कविता का एक विशेष पक्ष इसका भाव-विस्तार है—जहाँ प्रेम केवल मिलन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वियोग, वेदना और संवेदनाओं के हर रंग को अपने भीतर समेट लेता है। “द्रवित था प्रणय अपना, द्रवित ही रहने दो…” में प्रेम की वह परिपक्वता झलकती है, जो उसे बाँधने के बजाय बहने देना जानती है।
प्रमिला त्रिवेदी की यह रचना पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है—जहाँ वह अपने ही अनुभवों, स्मृतियों और अधूरे अहसासों से संवाद करने लगता है। यह कविता केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि जी ली जाती है।
अंततः, “ये प्रेम नहीं तो क्या है” केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि एक गूंज है—जो हर उस हृदय में सुनाई देती है, जिसने कभी सच्चे प्रेम को महसूस किया हो।
कविता
ये प्रेम नही तो क्या है
तुम प्रेम प्रणय की मूरत हो,
जीवन की सुखद जरूरत हो।
तुम मानो या फिर ना मानो ,
जानी अनजानी राहों पर,
तुम मेरी बहुत जरूरत हो,
अंतर्मन के पट खोल जरा,
हम एक दूजे में समाए हैं
ये इसलिए अहसास हुआ,
मन मंथन हृदय स्पर्श हुआ
एक ओर सामर्थ्य सबल है,
एक तरफ अस्तित्व प्रबल,
तुम हो प्रेम पथिक तो मैं भी
तुम्हीं कहो क्या हूँ निर्बल?
मैं सुगंध सी बिखर गई तो
प्रणय मोह फैला दूंगी,
अपने को मैं नहीं भूलूंगी
मै राग द्वेष भूला दूंगी।
हर्ष-उल्लास-उन्माद भरा हो,
मन अंदर विश्वास भरा हो,
टूटे मन की आस भरा हो
नदियों में भी नाद भरा हो।
द्रवित था प्रणय अपना,
द्रवित ही रहने दो
व्यथित था प्रणय अपना,
व्यथित ही रहने दो।
रचनाकार






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