संदेश

अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक सामाजिक स्वप्न से साकार संरचना तक के सफर संबंधी साक्षात्कार

चित्र
साक्षात्कार शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर भवन एक सामाजिक स्वप्न से साकार संरचना तक का सफर साक्षात्कारकर्ता : उलझन सुलझन का प्रतिनिधि साक्ष्यदाता : श्री वीरेन्द्र कुमार (केंद्रीय सेवा से सेवानिवृत्त और सजातीय संगठन गुर्जर सभा के अध्या) प्रश्न १. सबसे पहले, इस भव्य भवन के लोकार्पण पर आपको बहुत-बहुत बधाई। क्या आप इस भवन की परिकल्पना के मूल उद्देश्य के बारे में बताना चाहेंगे? उत्तर:  "धन्यवाद। इस भवन की परिकल्पना केवल एक निर्माण कार्य नहीं थी, बल्कि यह समाज को एक ऐसी साझा छत देने का प्रयास था जहाँ शिक्षा, संस्कार और सामाजिक एकता का विकास हो सके। हमारा उद्देश्य था कि आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा केंद्र मिले जहाँ वे अपनी प्रतिभा को पहचान सकें और समाज से जुड़ाव महसूस करें।" प्रश्न २. इस भवन का नाम *शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर* के नाम पर रखने के पीछे क्या भावना रही? उत्तर:  "शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर हमारे समाज के गौरव हैं। उनका बलिदान और देशभक्ति हमें प्रेरित करती है। हम चाहते थे कि इस भवन के माध्यम से युवाओं को उनके आदर्शों से परिचित कराया जाए, ताकि उनमें भी देश और समाज के प्रति ...

संतों की वाणी से बने विचार – 1

चित्र
संतों की वाणी से बने विचार 1 भूमिका मानव जीवन की भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच यदि कोई तत्व हमें भीतर से स्थिरता, शांति और दिशा प्रदान करता है, तो वह है—संतों की वाणी और सत्संग का सान्निध्य। संतों के विचार केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे जीवन जीने की एक सजीव पद्धति होते हैं, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराते हैं। सत्संग के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर छिपी अच्छाइयों को पहचानता है, विकारों से दूर होता है और प्रेम, समता तथा सद्गुणों की ओर अग्रसर होता है। प्रस्तुत विचार उसी आध्यात्मिक धारा का एक छोटा सा प्रयास हैं, जो जीवन को सरल, सार्थक और आनंदमय बनाने की प्रेरणा देते हैं। ।। हरिओम ।। संतों की वाणी से बने विचार 1 सत्संग क्या है, और इसे करने से क्या होता है? पहले हमें इसे समझना आवश्यक है। सत्संग में एक व्यक्ति अपने सुंदर वचनों को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाकर उसके भीतर ऐसी अच्छाई को जागृत करता है, जिससे उसे सुखमय जीवन जीने की कला आ जाती है। भजन का भाव हमारे मन को ईश्वर की ओर मोड़ता है। भजन में हम प्रभु का गुणगान तो करते हैं, किन्तु अपने लिए कुछ माँगने का भाव भी अक्सर बना रहता ह...

ये प्रेम नहीं तो क्या है?

चित्र
ये प्रेम नहीं तो क्या है? भूमिका प्रेम… एक ऐसा भाव, जो शब्दों में समेटा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। प्रेम की यही अनिर्वचनीयता जब अभिव्यक्ति का रूप लेती है, तो वह कविता बन जाती है—और जब वह आत्मा की गहराइयों से निकलती है, तो वह सीधे हृदय को स्पर्श करती है। प्रमिला त्रिवेदी की प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी अंतर्मन की सच्ची पुकार हैं। यहाँ प्रेम कोई आडंबर नहीं, कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि जीवन का एक गहन सत्य है—एक ऐसी आवश्यकता, जो व्यक्ति के अस्तित्व को पूर्णता देती है। “तुम प्रेम प्रणय की मूरत हो…” कहकर कवयित्री ने प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य धुरी के रूप में स्थापित किया है। इन पंक्तियों में एक ओर आत्मविश्वास से भरा स्त्री-स्वर है, तो दूसरी ओर समर्पण की मधुर ध्वनि भी। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि प्रेम का संतुलन है—जहाँ स्वाभिमान भी है और अपनापन भी। “तुम हो प्रेम पथिक तो मैं भी…” जैसी पंक्तियाँ इस बात को स्पष्ट करती हैं कि यह प्रेम किसी एक का नहीं, बल्कि दो आत्माओं के समानांतर प्रवाह का नाम है। कविता का एक विशेष पक्ष इसका भाव-विस्तार है—जहाँ प्रेम केवल मिलन तक सी...

भावभीनी श्रद्धांजलि

चित्र
भावभीनी श्रद्धांजलि हमारे पुरखे न्यास के सम्माननीय न्यासी, सरल व्यक्तित्व के धनी, सेवाभावी और समर्पित मार्गदर्शक डॉ. योगेंद्र सिंह जी का आज ब्रेन हेमरेज के कारण आकस्मिक निधन अत्यंत दुखद और हृदयविदारक समाचार है।  सहारनपुर निवासी डॉ. साहब ने अपने जीवन को समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। दिल्ली के झंडेवालान स्थित केशव भवन में संचालित उनका निःशुल्क होम्योपैथी चिकित्सालय केवल उपचार का केंद्र ही नहीं, बल्कि मानवता, संवेदना और सेवा का एक जीवंत उदाहरण था। डॉ. योगेंद्र सिंह जी ने न केवल असंख्य मरीजों का निःस्वार्थ उपचार किया, बल्कि उन्होंने अपने मार्गदर्शन, अनुभव और प्रेरणा से अनेक शिक्षित युवाओं को उनके लक्ष्य तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उन विरले व्यक्तित्वों में से थे, जो केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से दूसरों के जीवन में उजाला भरते हैं। उनका स्नेह, उनका मार्गदर्शन और उनका समर्पण युवा वर्ग के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा। उनके निधन से समाज ने एक कर्मयोगी, एक सच्चा सेवक और एक मार्गदर्शक व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। इस अपूरणीय क्षति से...