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भावाकुल उद्गार हैं ये

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हिमालय की गोद में आया जलप्रलय आपदा की चेतावनी के साथ बचाव और सावधानी का संदेश हर्षा ठक्कर ‘हिना’ काठमांडू/रसुवा। हिमालय की शांत और बर्फीली चोटियों के बीच बसी नेपाल की धरती ने 26 अगस्त को प्रकृति का ऐसा रौद्र रूप देखा, जिसने कुछ ही समय में जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। नेपाल-चीन सीमा से लगे रसुवा क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और मलबे के तेज बहाव ने घरों, सड़कों, पुलों, व्यापारिक केंद्रों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। कई लोगों की जान गई, जबकि अनेक लोगों के लापता होने की खबरें सामने आईं। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के खिसकने से नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव आया। बर्फ, पत्थर और मलबे से बना अस्थायी अवरोध टूटने के बाद पानी तेजी से घाटी की ओर बढ़ा और रास्ते में आने वाली कई संरचनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। त्रिशूली नदी के जलस्तर में भी थोड़े समय में तेज वृद्धि हुई। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में रसुवागढ़ी सीमा क्षेत्र भी शामिल रहा। यह नेपाल और चीन के बीच व्यापार और आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग है। बाढ़ ...

राखी का धागा

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राखी का धागा कलाई पर बँधता है धागा, पर रिश्ता दिल में बँध जाता है, एक छोटी-सी राखी से पूरा बचपन लौट आता है। वो रूठना, फिर मान जाना, बिन बातों के सब कह जाना, थोड़ी-सी मेरी शरारत पर तेरा चुपके से मुस्कुराना। समय भले ही दूर ले जाए, रास्ते कितने बदल जाएँ, भाई-बहन के इस रिश्ते में फिर भी मौसम कहाँ बदल पाएँ। राखी केवल पर्व नहीं है, ये बचपन की मीठी याद है, भाई की कलाई पर बहन का स्नेह भरा एक वादा है। न माँगूँ मैं महँगे उपहार, न चाहूँ कोई बड़ी निशानी, बस यूँ ही बना रहे जीवन में मेरे भाई, तेरी मेहरबानी। जब दुनिया थोड़ी कठिन लगे, जब मन कहीं घबराने लगे, तेरा होना ही काफी है, दिल फिर खुद को समझाने लगे। रक्षा का अर्थ सिर्फ इतना नहीं— कि भाई बहन की रक्षा करे, बल्कि दोनों एक-दूजे के हर सुख-दुख में साथ खड़े। राखी का ये पावन धागा उम्र की सीमा जानता नहीं, भाई-बहन का सच्चा रिश्ता कभी पुराना होता नहीं। कलाई पर धागा छोटा है, पर भाव बहुत विशाल है, मेरे भाई, तू पास रहे या दूर— तेरा होना ही मेरा विश्वास है।

राखी… एक पवित्र धागा

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  राखी… एक पवित्र धागा राखी एक पवित्र धागा... जिसके रंग-बिरंगे धागों में छिपा है बहन का पावन प्यार। राखी… एक पवित्र धागा रंग-बिरंगी, खूबसूरत राखी हाथों में लिए मैं बचपन की यादों में खो गई। वह लंबा-सा बरामदा... जिसमें आगे-आगे भाई और पीछे-पीछे मैं। “भाई... भाई...” की गुहार लगाते हुए उनके पीछे भाग रही थी। पसीने से लथपथ, मगर कदमों में जैसे कोई थकान ही नहीं थी। तभी अचानक मुझे ठोकर लगी। भाई ने मेरी हल्की-सी चीख ज्यों ही सुनी, पलटकर दौड़े आए। मुझे उठाया और चोट पर फूँक मारकर उस दर्द को कम करने लगे, जो शायद था ही नहीं। और मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह बचपन का जमाना भी क्या जमाना था... भाई से लड़ना और फिर उन्हीं से ढेर सारा प्यार पाना। हर राखी पर अपने मनपसंद उपहार के लिए पहले से ही जिद करना और उसे पाने के बाद मेरे चेहरे पर आने वाले संतुष्टि के भाव... कि पूछो मत! माँ की डाँट से बचाने के लिए भाई को जल्दी उठाना। उनकी हर कमी को खूबी बताकर फूले न समाना। और सबकी नजरों में उन्हें हीरो बनाने के लिए कुछ भी कर जाना। बड़े होते-होते थोड़ी समझदारी आई और भाई मेरे लिए और भी खास हो गए। मेरे सबसे अच्छे दोस्त......

भावाकुल उद्गार

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प्रकृति के संकेतों को समझना होगा कल अचानक हुई तेज बारिश ने महज आधे घंटे में पूरे बाजार की तस्वीर बदल दी। घरों और दुकानों में लगभग दो फीट तक पानी भर गया। नालियों की सारी गंदगी सड़कों पर आ गई और सड़क का पानी घरों-दुकानों के भीतर घुस गया। असहाय लोग अपनी आँखों के सामने यह सब होता देखते रहे—मानो प्रकृति के इस रौद्र रूप के आगे उनके हाथ बंधे हों। यह केवल एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि बदलती हुई परिस्थितियों का एक छोटा-सा उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में कुछ ही घंटों की बारिश से शहरों का जलमग्न हो जाना, सड़कों का डूब जाना और वाहनों का पानी में फँस जाना आम होता जा रहा है। कभी विचार किया है कि पिछले दस वर्षों में स्थिति किस तरह लगातार बिगड़ती गई है? एक समय था जब कई दिनों तक लगातार बारिश होने के बावजूद ऐसे भयावह दृश्य देखने को नहीं मिलते थे। पानी को बहने का रास्ता मिलता था। नदियाँ और तालाब वर्षाजल से लबालब भर जाते थे और बारिश के बाद सड़कें धुलकर स्वच्छ हो जाती थीं। प्रकृति का अपना एक संतुलित तंत्र था, जिसमें वर्षा का पानी अपना रास्ता स्वयं खोज लेता था। लेकिन आज हमने उस प्राकृतिक व्यवस्था में लगातार...

जीवन के प्रति नज़रिया

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वो बचपन फिर कहाँ?  भूमिका क्या सचमुच बचपन बीत जाता है, या हम बड़े होकर अपने ही भीतर छिपे उस बच्चे से दूर हो जाते हैं? क्या खुशियों के लिए बहुत सारे साधन जरूरी हैं, या कुछ सच्चे साथी, खुला आकाश और निष्कपट मन ही जीवन को सुंदर बना देते हैं? और क्या आज की सुविधाओं से भरी दुनिया में हम अनजाने ही उस बचपन को खो रहे हैं, जिसमें भाषाएँ अलग थीं, संस्कृतियाँ अलग थीं, लेकिन दिलों के बीच कोई दूरी नहीं थी? सरोज प्रसाद राय की कविता 'वो बचपन फिर कहाँ' इन्हीं प्रश्नों को हमारे सामने रखती है। यह केवल बीते हुए बचपन की स्मृति नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक आत्मीयता, निश्छल मित्रता और सामूहिक जीवन का भावपूर्ण दस्तावेज है। कविता हमें अपने अतीत की उन गलियों में ले जाती है, जहाँ साधन कम थे, मगर अपनापन बहुत था; खिलौने सीमित थे, मगर खेलने वाले साथी अनगिनत थे; भाषाएँ अलग थीं, मगर दिलों की भाषा एक थी। काव्य रचना हम सब सात साल के थे, आगरा में था बसेरा, पापा फौजी, आर्मी कॉलोनी, वहीं था अपना जग सारा। न मोबाइल की कोई दुनिया, न स्क्रीन का था पहरा, मिट्टी में खेला करते थे, खुला-खुला था मन गहरा। कोई मराठी गीत सु...

लेखनी की व्यथा

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लेखनी की व्यथा भूमिका क्या शब्दों में मनुष्य के भीतर छिपे हर भाव को उतारा जा सकता है? क्या हर पीड़ा को शब्द मिल सकते हैं, हर आँसू को कविता और हर मौन को कोई अर्थ दिया जा सकता है? या फिर कुछ भाव ऐसे भी होते हैं, जो शब्दों की सीमा से परे रहकर केवल हृदय में धड़कते रहते हैं? 'लेखनी की व्यथा' केवल एक लेखिका की कलम की कहानी नहीं है। यह उस संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति है, जो बहुत कुछ महसूस करता है, बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन कभी-कभी शब्द उसका साथ छोड़ देते हैं। लेखनी यहाँ केवल लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि एक मौन साथी, विश्वासपात्र और मन की सच्ची पहचान बनकर सामने आती है। प्रमिला त्रिवेदी की यह रचना बताती है कि जब मनुष्य अपनी बात कह नहीं पाता, तब कागज़ और कलम उसके मौन को आवाज़ दे सकते हैं। लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करती है कि हर अनुभूति को शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं—कुछ भाव मौन में ही सबसे अधिक गहरे और सच्चे बने रहते हैं। काव्य रचना मेरी लेखनी भी कभी-कभी चुप होकर बैठ जाती है, मन में उठते भावों को कागज़ तक ला नहीं पाती है। स्याही में डूबे शब्द मगर, कितने राज़ छुपाए हैं, कुछ आँसू बनकर...