राखी… एक पवित्र धागा
राखी… एक पवित्र धागा
राखी एक पवित्र धागा...
जिसके रंग-बिरंगे धागों में छिपा है बहन का पावन प्यार।
राखी… एक पवित्र धागा
रंग-बिरंगी, खूबसूरत राखी हाथों में लिए मैं बचपन की यादों में खो गई।
वह लंबा-सा बरामदा...
जिसमें आगे-आगे भाई और पीछे-पीछे मैं।
“भाई... भाई...” की गुहार लगाते हुए उनके पीछे भाग रही थी। पसीने से लथपथ, मगर कदमों में जैसे कोई थकान ही नहीं थी।
तभी अचानक मुझे ठोकर लगी।
भाई ने मेरी हल्की-सी चीख ज्यों ही सुनी, पलटकर दौड़े आए। मुझे उठाया और चोट पर फूँक मारकर उस दर्द को कम करने लगे, जो शायद था ही नहीं।
और मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी।
वह बचपन का जमाना भी क्या जमाना था...
भाई से लड़ना और फिर उन्हीं से ढेर सारा प्यार पाना।
हर राखी पर अपने मनपसंद उपहार के लिए पहले से ही जिद करना और उसे पाने के बाद मेरे चेहरे पर आने वाले संतुष्टि के भाव... कि पूछो मत!
माँ की डाँट से बचाने के लिए भाई को जल्दी उठाना।
उनकी हर कमी को खूबी बताकर फूले न समाना।
और सबकी नजरों में उन्हें हीरो बनाने के लिए कुछ भी कर जाना।
बड़े होते-होते थोड़ी समझदारी आई और भाई मेरे लिए और भी खास हो गए।
मेरे सबसे अच्छे दोस्त... और मेरे हमदर्द भी।
घंटों बैठकर हम एक-दूसरे के भविष्य के सपने देखते और अचानक उदास हो जाते—यह सोचकर कि एक दिन हमें दूर होना पड़ेगा।
पर तभी भाई मुझे हँसाने के लिए कहते—
“सावन में मैं आऊँगा ना तुझसे मिलने...”
और मैं फिर हँस पड़ती।
मेरी शादी को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित भाई ही थे।
वे उस लड़के में अपना ही प्रतिबिंब चाहते थे, ताकि मुझे कभी उनकी कमी महसूस न हो।
और इसमें वे कामयाब भी हो गए।
मेरी शादी में सबसे ज्यादा भाई ही रोए थे...
वही भाई, जो कहा करते थे—
“पता नहीं कब तुमसे पीछा छूटेगा!”
आज फिर गरजता-बरसता सावन आया है।
साथ में राखी की यादें भी ले आया है।
हाथों में राखी लिए मैं फिर उसी बरामदे में पहुँच गई हूँ...
जहाँ एक छोटी-सी लड़की अपने भाई के पीछे भाग रही है।
आँखों में बचपन है...
होठों पर मुस्कान है...
और दिल में भाई के आने का इंतज़ार।
मैं धीरे से गुनगुना उठी—
“मेरे भैया, मेरे चंदा,
मेरे अनमोल रतन...”
और आँखों में खुशी लिए बस यही इंतज़ार करती रही—
इस सावन...
भैया आएँगे ना?



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