पापा का साथ - सुनिता मीना
पापा का साथ लंबे समय से मैं पापा के साथ रह रही हूँ। जब वे सक्षम, सबल और शारीरिक रूप से स्वस्थ थे, तब अपनी सभी जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा से निभाते रहे। हमें कभी किसी बात को लेकर परेशान होने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हमारी जिंदगी सहजता से चलती रही और पापा हमारे लिए हर जिम्मेदारी का मजबूत सहारा बने रहे। रिटायरमेंट के बाद उम्र बढ़ने लगी। शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगा और बीमारियों ने भी साथ पकड़ना शुरू कर दिया। जब पापा तन और मन, दोनों स्तरों पर पहले की अपेक्षा कमजोर होने लगे, तब पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि अब उन्हें हमारे साथ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। हम उनके और करीब आ गए और उनकी हर छोटी-बड़ी तकलीफ हमारी अपनी तकलीफ बनती चली गई। समय का चक्र जैसे पूरा घूम गया था। कभी हमारी हर परेशानी पापा की परेशानी हुआ करती थी; अब उनकी तकलीफ हमारी चिंता बन गई थी। उनके साथ रहते-रहते अपनापन और गहरा होता गया। उनकी सार-संभाल में केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक अलग ही लगाव और आत्मीयता महसूस होने लगी। पहले पापा अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज में व्यस्त रहते थे; अब उनका ध्यान रखना ही हमारे जीवन की एक महत...