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पापा का साथ - सुनिता मीना

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  पापा का साथ लंबे समय से मैं पापा के साथ रह रही हूँ। जब वे सक्षम, सबल और शारीरिक रूप से स्वस्थ थे, तब अपनी सभी जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा से निभाते रहे। हमें कभी किसी बात को लेकर परेशान होने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हमारी जिंदगी सहजता से चलती रही और पापा हमारे लिए हर जिम्मेदारी का मजबूत सहारा बने रहे। रिटायरमेंट के बाद उम्र बढ़ने लगी। शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगा और बीमारियों ने भी साथ पकड़ना शुरू कर दिया। जब पापा तन और मन, दोनों स्तरों पर पहले की अपेक्षा कमजोर होने लगे, तब पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि अब उन्हें हमारे साथ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। हम उनके और करीब आ गए और उनकी हर छोटी-बड़ी तकलीफ हमारी अपनी तकलीफ बनती चली गई। समय का चक्र जैसे पूरा घूम गया था। कभी हमारी हर परेशानी पापा की परेशानी हुआ करती थी; अब उनकी तकलीफ हमारी चिंता बन गई थी। उनके साथ रहते-रहते अपनापन और गहरा होता गया। उनकी सार-संभाल में केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक अलग ही लगाव और आत्मीयता महसूस होने लगी। पहले पापा अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज में व्यस्त रहते थे; अब उनका ध्यान रखना ही हमारे जीवन की एक महत...

स्वाभिमान भीतर बसता है, अभिमान बाहर छलकता है

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स्वाभिमान भीतर बसता है, अभिमान बाहर छलकता है आचार्य निखिल जी महाराज कहते हैं— “इंसान में जो समा जाए, वो स्वाभिमान है.. और जो छलक जाए, वो अभिमान है..!” यह छोटी-सी पंक्ति मनुष्य के व्यक्तित्व के दो अत्यंत सूक्ष्म पक्षों के बीच का अंतर समझाती है। इस कथन के पीछे उनकी मनःस्थिति को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे मनुष्य को स्वयं के भीतर झाँकने के लिए प्रेरित कर रहे हैं—यह देखने के लिए कि उसके भीतर जो सम्मान, उपलब्धि, ज्ञान, सामर्थ्य या पहचान है, वह उसे भीतर से संतुलित और विनम्र बना रही है अथवा दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा सिद्ध करने की आवश्यकता पैदा कर रही है। गुरुजी मानो कह रहे हैं— “बंदे, तुम्हें अपने मूल्य का बोध होना चाहिए, पर अपने मूल्य का ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्यों हो? जिस वृक्ष पर फल आते हैं, उसकी शाखाएँ प्रायः झुक जाती हैं। फल वृक्ष के भीतर नहीं छिपते, वे दिखाई देते हैं; लेकिन वृक्ष अपने फल होने का शोर नहीं करता। उसकी सार्थकता उसके अस्तित्व और उसके देने में है, घोषणा में नहीं।” स्वाभिमान वह आंतरिक भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं का सम्मान करता है, अपनी गरिमा पहचानता है और गलत के ...

तपकर ही तैयार होता है दायित्व का पात्र - आचार्य निखिल

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तपकर ही तैयार होता है दायित्व का पात्र आचार्य निखिल जी महाराज कहते हैं—  “नियति जिसे कोई दायित्व यदि सौंपना चाहती है; तो उसे लाक्षागृह के षड्यंत्रों, वनवास के संघर्षों, और अज्ञातवास के एकांत की संकरी गलियों से गुजार कर तपा अवश्य देती है..!!” बंदे, जीवन में जब कठिनाइयाँ आती हैं तो मनुष्य सबसे पहले यही पूछता है— “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” लेकिन क्या तुमने कभी यह भी पूछा है कि “शायद यह समय मुझे किसी ऐसी जिम्मेदारी के योग्य बनाने आया है, जिसके लिए मेरा वर्तमान स्वरूप अभी पर्याप्त नहीं है?” गुरुजी के इस कथन में मुझे शिकायत से अधिक स्वीकार का भाव दिखाई देता है। ऐसा लगता है जैसे वे जीवन की कठिन परिस्थितियों को केवल संकट के रूप में देखने से रोक रहे हैं। उनकी दृष्टि में लाक्षागृह केवल षड्यंत्र का प्रतीक नहीं, बल्कि वह परिस्थिति है जहाँ बाहरी सुरक्षा अचानक समाप्त हो जाती है और मनुष्य को अपनी बुद्धि, धैर्य और साहस पर भरोसा करना पड़ता है। वनवास केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि सुविधा से दूरी और आत्मबल से निकटता का प्रतीक है। और अज्ञातवास केवल छिपकर रहने का समय नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ व्यक्त...