तपकर ही तैयार होता है दायित्व का पात्र - आचार्य निखिल
तपकर ही तैयार होता है दायित्व का पात्र
आचार्य निखिल जी महाराज कहते हैं—
“नियति जिसे कोई दायित्व यदि सौंपना चाहती है; तो उसे लाक्षागृह के षड्यंत्रों, वनवास के संघर्षों, और अज्ञातवास के एकांत की संकरी गलियों से गुजार कर तपा अवश्य देती है..!!”
बंदे, जीवन में जब कठिनाइयाँ आती हैं तो मनुष्य सबसे पहले यही पूछता है— “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” लेकिन क्या तुमने कभी यह भी पूछा है कि “शायद यह समय मुझे किसी ऐसी जिम्मेदारी के योग्य बनाने आया है, जिसके लिए मेरा वर्तमान स्वरूप अभी पर्याप्त नहीं है?”
गुरुजी के इस कथन में मुझे शिकायत से अधिक स्वीकार का भाव दिखाई देता है। ऐसा लगता है जैसे वे जीवन की कठिन परिस्थितियों को केवल संकट के रूप में देखने से रोक रहे हैं। उनकी दृष्टि में लाक्षागृह केवल षड्यंत्र का प्रतीक नहीं, बल्कि वह परिस्थिति है जहाँ बाहरी सुरक्षा अचानक समाप्त हो जाती है और मनुष्य को अपनी बुद्धि, धैर्य और साहस पर भरोसा करना पड़ता है। वनवास केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि सुविधा से दूरी और आत्मबल से निकटता का प्रतीक है। और अज्ञातवास केवल छिपकर रहने का समय नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति को बिना पहचान, बिना प्रशंसा और बिना बाहरी सहारे के अपने कर्तव्य को निभाना पड़ता है।
बंदे, नियति जब किसी मनुष्य को किसी बड़े दायित्व के योग्य बनाना चाहती है, तो सबसे पहले उसके भीतर से वे सहारे हटाती है जिन पर वह अनावश्यक रूप से निर्भर है। उसे ऐसी परिस्थितियों से मिलाती है जहाँ उसे अपने निर्णय स्वयं लेने पड़ते हैं। उसे ऐसे रास्तों से गुजारती है जहाँ तालियाँ नहीं होतीं, लेकिन परीक्षा होती है; जहाँ प्रशंसा नहीं होती, लेकिन धैर्य चाहिए; जहाँ साथ देने वाले कम होते हैं, लेकिन अपने भीतर की आवाज अधिक स्पष्ट सुनाई देती है।
महाभारत का प्रसंग देखो। पांडवों के जीवन में लाक्षागृह का संकट आया। उसके बाद वनवास आया और फिर अज्ञातवास। यदि केवल बाहरी दृष्टि से देखा जाए तो यह सब विपत्ति, अपमान और संघर्ष की श्रृंखला दिखाई देती है। लेकिन इसी यात्रा में उनके धैर्य, संयम, एकता, विवेक और संघर्षशीलता की परीक्षा हुई। कठिन समय ने उन्हें केवल कष्ट नहीं दिया; उसने उन्हें परिस्थितियों को समझना और उनके बीच अपना मार्ग बनाना भी सिखाया।
गुरुजी मानो समझा रहे हों— “बंदे, तपने का अर्थ टूटना नहीं है। सोना आग में इसलिए नहीं जाता कि उसे नष्ट किया जाए; वह इसलिए तपाया जाता है कि उसकी अशुद्धियाँ दूर हों और उसकी वास्तविक चमक सामने आए। लेकिन याद रखना, हर कठिनाई को किसी निश्चित भविष्य की गारंटी मान लेना भी उचित नहीं। जीवन की हर पीड़ा का अर्थ तुरंत समझ में नहीं आता। कई बार उसका अर्थ वर्षों बाद खुलता है।”
एक दृष्टांत सुनो। एक शिल्पकार के पास पत्थर का एक बड़ा टुकड़ा आया। उसने उस पर हथौड़ी चलानी शुरू की। पत्थर को लगा कि उस पर लगातार चोट क्यों की जा रही है। उसके पास पड़ा दूसरा पत्थर बिना किसी चोट के वैसे ही पड़ा रहा। कुछ समय बाद शिल्पकार ने पहले पत्थर से एक सुंदर मूर्ति बना दी और दूसरे को सीढ़ी के रूप में उपयोग कर लिया।
पहला पत्थर यदि बोल पाता तो शायद कहता— “मेरे हिस्से में इतनी चोटें क्यों आईं?”
शिल्पकार का उत्तर होता— “क्योंकि तुम्हारे भीतर एक आकार छिपा था, जिसे बाहर आने के लिए चोटों की आवश्यकता थी।”
गुरुजी इसी भाव को जीवन पर लागू करते हुए कहते हैं— “बंदे, हर चोट तुम्हें मूर्ति नहीं बनाती और हर संघर्ष अपने आप महानता नहीं देता। लेकिन यदि कठिन समय में तुम सीखते हो, अपने भीतर झाँकते हो, अपनी कमियों को पहचानते हो और फिर भी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ते, तब वही संघर्ष तुम्हारे व्यक्तित्व को गढ़ने लगता है।”
एक और दृष्टांत है। एक नदी पहाड़ से निकलती है। उसे रास्ते में चट्टानें मिलती हैं, संकरे मोड़ मिलते हैं, ऊँचाई से नीचे गिरना पड़ता है और कभी उसका रास्ता मिट्टी रोक देती है। लेकिन नदी रुकती नहीं। वह अपनी दिशा बनाए रखते हुए कभी चट्टान के किनारे से निकलती है, कभी उसे काटकर रास्ता बनाती है और कभी अपनी धारा को मोड़ देती है।
गुरुजी कहते हैं— “जीवन भी नदी की तरह है। कठिनाई आने पर दिशा बदलना हमेशा हार नहीं होता। कभी-कभी दिशा बदलना ही आगे बढ़ने का विवेक होता है। लक्ष्य के प्रति निष्ठा और मार्ग के प्रति लचीलापन— यही संघर्ष को साधना बनाता है।”
इस कथन में “दायित्व” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। दायित्व केवल पद या अधिकार नहीं है। दायित्व का अर्थ है— किसी कार्य, व्यक्ति, परिवार, समाज या उद्देश्य के प्रति उत्तरदायित्व। जितना बड़ा दायित्व होता है, उतना ही अधिक आत्मसंयम, धैर्य और विवेक आवश्यक होता है। इसलिए जीवन कभी-कभी हमें पहले उस भार को उठाने योग्य बनाता है, जिसे भविष्य में हमारे कंधों पर रखना है।
कभी तुम्हें अकेलापन मिलता है ताकि तुम अपने भीतर की आवाज सुन सको। कभी असफलता मिलती है ताकि सफलता के साथ विनम्र रहना सीखो। कभी किसी का साथ छूटता है ताकि अपनी आंतरिक शक्ति पहचान सको। कभी योजनाएँ विफल होती हैं ताकि तुम परिणाम के बजाय प्रक्रिया और कर्म पर ध्यान देना सीखो।
लेकिन गुरुजी की इस वाणी को भाग्यवाद के रूप में समझना उचित नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि हर अन्याय को चुपचाप सह लिया जाए या हर पीड़ा को यह कहकर स्वीकार कर लिया जाए कि “नियति ऐसा ही चाहती थी।” आत्मिक दृष्टि का अर्थ विवेक खो देना नहीं है। जहाँ अन्याय के विरुद्ध आवाज आवश्यक हो, वहाँ आवाज उठाना भी दायित्व है। जहाँ सहायता माँगना आवश्यक हो, वहाँ सहायता माँगना भी बुद्धिमानी है। जहाँ परिस्थिति बदलना संभव हो, वहाँ प्रयत्न करना ही पुरुषार्थ है।
गुरुजी की मनःस्थिति शायद इसी संतुलन की ओर संकेत करती है— परिस्थितियों को स्वीकार करो, लेकिन निष्क्रिय मत बनो; संघर्ष को समझो, लेकिन उससे अपनी पहचान मत बनाओ; कठिनाई से सीखो, लेकिन कठिनाई को अपनी नियति का अंतिम सत्य मत मानो।
बंदे, जब जीवन तुम्हें किसी संकरे रास्ते से ले जाए तो तुरंत यह मत मान लेना कि तुम भटक गए हो। संभव है वह रास्ता तुम्हें तुम्हारे भीतर के किसी ऐसे हिस्से से मिलाने आया हो, जिसे आराम के दिनों में तुम कभी पहचान ही नहीं पाते।
वनवास का सबसे बड़ा अर्थ जंगल में रहना नहीं था; वह अपने भीतर के धैर्य से मिलना भी था। अज्ञातवास का सबसे बड़ा अर्थ पहचान छिपाना नहीं था; वह बिना पहचान के भी अपने कर्तव्य को निभाने की क्षमता अर्जित करना था। और लाक्षागृह का सबसे बड़ा संदेश केवल षड्यंत्र से बच निकलना नहीं, बल्कि संकट के बीच विवेक को जीवित रखना था।
इसलिए जब जीवन तुम्हें तपाए तो केवल यह मत पूछना— “यह मेरे साथ क्यों हो रहा है?” कभी शांत होकर यह भी पूछना— “यह परिस्थिति मुझे क्या सिखाने आई है? मेरे भीतर क्या बदलना चाहती है? कौन-सी कमजोरी है जिसे मुझे शक्ति में बदलना है?”
क्योंकि हो सकता है आज का संघर्ष कल की जिम्मेदारी की तैयारी हो। हो सकता है आज का एकांत कल के निर्णयों की स्पष्टता दे। हो सकता है आज की असफलता तुम्हें उस विनम्रता से परिचित करा रही हो, जिसकी आवश्यकता कल किसी बड़ी सफलता को संभालने में पड़े।
गुरुजी की वाणी मानो अंत में यही कहती है— “बंदे, कठिन रास्ते से घबराना मत। हर कठिन रास्ता तुम्हें किसी बड़े मुकाम तक ले जाए, यह आवश्यक नहीं; लेकिन हर कठिन रास्ते से तुम कुछ सीखकर निकलो, यह तुम्हारे हाथ में अवश्य है। नियति अपना काम करे या न करे, तुम अपना पुरुषार्थ मत छोड़ना।”
और शायद यही इस पूरे चिंतन का सबसे गहरा भाव है— जीवन की आग से बच निकलना ही सफलता नहीं; उस आग से गुजरते हुए अपने भीतर की धातु को अधिक मजबूत, अधिक निर्मल और अधिक उत्तरदायी बना लेना भी जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है।
सृजक
आचार्य निखिल जी महाराज
प्रस्तुति







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