पापा का साथ - सुनिता मीना

 पापा का साथ

लंबे समय से मैं पापा के साथ रह रही हूँ। जब वे सक्षम, सबल और शारीरिक रूप से स्वस्थ थे, तब अपनी सभी जिम्मेदारियाँ पूरी निष्ठा से निभाते रहे। हमें कभी किसी बात को लेकर परेशान होने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हमारी जिंदगी सहजता से चलती रही और पापा हमारे लिए हर जिम्मेदारी का मजबूत सहारा बने रहे।

रिटायरमेंट के बाद उम्र बढ़ने लगी। शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगा और बीमारियों ने भी साथ पकड़ना शुरू कर दिया। जब पापा तन और मन, दोनों स्तरों पर पहले की अपेक्षा कमजोर होने लगे, तब पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि अब उन्हें हमारे साथ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। हम उनके और करीब आ गए और उनकी हर छोटी-बड़ी तकलीफ हमारी अपनी तकलीफ बनती चली गई।

समय का चक्र जैसे पूरा घूम गया था। कभी हमारी हर परेशानी पापा की परेशानी हुआ करती थी; अब उनकी तकलीफ हमारी चिंता बन गई थी। उनके साथ रहते-रहते अपनापन और गहरा होता गया। उनकी सार-संभाल में केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक अलग ही लगाव और आत्मीयता महसूस होने लगी।

पहले पापा अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज में व्यस्त रहते थे; अब उनका ध्यान रखना ही हमारे जीवन की एक महत्वपूर्ण व्यस्तता बन गया था। कभी डॉक्टर के पास जाना, कभी अस्पताल के चक्कर लगाना और कभी घर पर उनकी सेवा-सुश्रूषा में लगे रहना—इन सबके बीच भी मन को एक अनोखा सुकून मिलता था।

हर पल यही ध्यान रहता कि उन्हें कहीं दर्द तो नहीं हो रहा, किसी तरह की परेशानी तो नहीं है, भूख तो नहीं लगी, क्या खिलाया जाए और उनके लिए क्या सर्वोत्तम रहेगा। उनकी छोटी-सी जरूरत को समझ लेना और बिना कहे उसे पूरा कर देना जैसे हमारे दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।

इन्हीं सुनहरे पलों के बीच जिंदगी आगे बढ़ रही थी। उनके पास बैठना, उनकी देखभाल करना और उनकी जरूरतों को समझना भीतर तक एक ऐसी शांति देता था, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त कर पाना कठिन है। मन भाव-विभोर हो उठता और लगता कि जीवन ने हमें अपने ही रूप में एक अनमोल अवसर दिया है—उनके प्रति अपना प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का।

सच तो यह है कि पापा का साथ केवल हमारे जीवन का एक संबंध नहीं, बल्कि हमारे लिए एक आशीर्वाद है। वे कभी हमारे साथ नहीं रहे; बल्कि हम उनके साथ रहे। यही बात आज हमारे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है।

जिस तरह उन्होंने अपने सक्षम समय में हमारी जिंदगी को सहज बनाया, उसी तरह जीवन ने हमें उनके कमजोर पड़ते समय उनके साथ खड़े होने का अवसर दिया। शायद यही रिश्तों की सबसे सुंदर सार्थकता है—जिस हाथ ने कभी हमें संभाला था, समय आने पर उसी हाथ को थाम लेने का सौभाग्य मिलना।

रचनाकार

 
सुनिता मीना



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