स्वाभिमान भीतर बसता है, अभिमान बाहर छलकता है
स्वाभिमान भीतर बसता है, अभिमान बाहर छलकता है
आचार्य निखिल जी महाराज कहते हैं— “इंसान में जो समा जाए, वो स्वाभिमान है.. और जो छलक जाए, वो अभिमान है..!” यह छोटी-सी पंक्ति मनुष्य के व्यक्तित्व के दो अत्यंत सूक्ष्म पक्षों के बीच का अंतर समझाती है। इस कथन के पीछे उनकी मनःस्थिति को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे मनुष्य को स्वयं के भीतर झाँकने के लिए प्रेरित कर रहे हैं—यह देखने के लिए कि उसके भीतर जो सम्मान, उपलब्धि, ज्ञान, सामर्थ्य या पहचान है, वह उसे भीतर से संतुलित और विनम्र बना रही है अथवा दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा सिद्ध करने की आवश्यकता पैदा कर रही है।
गुरुजी मानो कह रहे हैं— “बंदे, तुम्हें अपने मूल्य का बोध होना चाहिए, पर अपने मूल्य का ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्यों हो? जिस वृक्ष पर फल आते हैं, उसकी शाखाएँ प्रायः झुक जाती हैं। फल वृक्ष के भीतर नहीं छिपते, वे दिखाई देते हैं; लेकिन वृक्ष अपने फल होने का शोर नहीं करता। उसकी सार्थकता उसके अस्तित्व और उसके देने में है, घोषणा में नहीं।”
स्वाभिमान वह आंतरिक भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं का सम्मान करता है, अपनी गरिमा पहचानता है और गलत के सामने स्वयं को छोटा नहीं करता। उसे हर क्षण दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। वह जानता है कि उसे क्या करना उचित है और क्या नहीं। इसके विपरीत अभिमान तब प्रकट होने लगता है जब व्यक्ति अपने गुण, पद, धन, ज्ञान या उपलब्धि को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण मानने लगता है और चाहता है कि दूसरे भी निरंतर उसे श्रेष्ठ मानते रहें।
आचार्य निखिल की वाणी में यहाँ एक गहरी आत्मिक चेतावनी अनुभव होती है— **स्वाभिमान को संभालकर रखो, लेकिन अभिमान को अपने ऊपर सवार मत होने दो।** क्योंकि स्वाभिमान व्यक्ति को स्थिर करता है, जबकि अभिमान उसे दूसरों की दृष्टि का बंदी बना सकता है। स्वाभिमानी व्यक्ति अपने मूल्य को जानता है; अभिमानी व्यक्ति चाहता है कि संसार उसके मूल्य की घोषणा करता रहे।
गुरुजी एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक गाँव में दो व्यक्ति थे। दोनों ने अपने परिश्रम से बहुत कुछ प्राप्त किया था। एक व्यक्ति जब भी किसी जरूरतमंद की सहायता करता, तो चुपचाप अपना काम कर आगे बढ़ जाता। दूसरा व्यक्ति भी सहायता करता, लेकिन उसके साथ यह अपेक्षा रहती कि लोग उसके कार्य की प्रशंसा करें, उसका नाम लें और उसकी महानता की चर्चा करें।
एक दिन गाँव के एक वृद्ध ने दोनों को देखकर कहा— “तुम दोनों ने एक जैसा कार्य किया, लेकिन तुम्हारे भीतर उसका स्थान अलग है। एक ने सेवा को अपने स्वभाव में उतार लिया, दूसरे ने सेवा को अपनी पहचान बना लिया।”
गुरुजी समझाते हैं— “बंदे, जब कोई अच्छा काम तुम्हारे स्वभाव का हिस्सा बन जाए और उसके लिए तालियों की आवश्यकता न रहे, तब समझना कि तुम्हारे भीतर कुछ सुंदर उतर रहा है। लेकिन यदि हर अच्छे काम के बाद तुम्हें अपनी प्रशंसा सुनने की बेचैनी हो, तो स्वयं से पूछना कि तुमने सेवा की है या अपनी छवि बनाई है।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक नदी पहाड़ों से निकलकर मैदानों की ओर बहती थी। रास्ते में उसने अनेक खेतों को पानी दिया, पेड़ों को जीवन दिया और प्यासे लोगों की प्यास बुझाई। किसी ने नदी से पूछा— “तुम इतना देती हो, फिर तुम्हें अपने देने पर गर्व क्यों नहीं होता?”
नदी मुस्कुराकर बोली— “मैं देती हूँ क्योंकि बहना मेरा स्वभाव है। यदि मैं हर बार यह सोचूँ कि किसने मेरा धन्यवाद किया, किसने मेरा नाम लिया और किसने मेरी प्रशंसा की, तो शायद मैं बहना ही भूल जाऊँ।”
गुरुजी कहते हैं— “यही स्वाभिमान की सुंदरता है। वह भीतर शक्ति देता है, पर बाहर प्रदर्शन नहीं माँगता। वह व्यक्ति को ऊँचा उठाता है, दूसरों को नीचा दिखाकर नहीं।”
इस कथन का एक और गहरा पक्ष है। स्वाभिमान का अर्थ अहंकारपूर्वक अपनी बात मनवाना नहीं है। कभी-कभी व्यक्ति अपने कठोर व्यवहार को भी स्वाभिमान का नाम दे देता है। लेकिन जहाँ अपने सम्मान की रक्षा के साथ दूसरे के सम्मान की भी चिंता बनी रहे, वहाँ स्वाभिमान अधिक परिपक्व रूप लेता है। स्वाभिमान कहता है— “मैं स्वयं को छोटा नहीं करूँगा।” अभिमान कहता है— “मैं तुम्हें अपने से छोटा साबित करके ही रहूँगा।” इन दोनों के बीच यही सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।
गुरुजी मानो अपने शिष्यों से कह रहे हों— “बंदे, अपने ज्ञान पर विश्वास रखो, लेकिन यह मत भूलो कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। अपनी उपलब्धियों पर प्रसन्न होओ, लेकिन यह मत समझो कि अब यात्रा समाप्त हो गई। अपने सम्मान की रक्षा करो, लेकिन दूसरों का सम्मान छीनकर नहीं। तुम्हारी ऊँचाई तब सार्थक है जब तुम्हारे पास खड़े व्यक्ति को छोटा महसूस न हो।”
संभवतः इसी भावभूमि से यह कथन निकला है कि **जो मनुष्य में समा जाए, वह स्वाभिमान है।** अर्थात उपलब्धि तुम्हारे व्यक्तित्व को समृद्ध करे, तुम्हारे व्यवहार में संयम लाए, तुम्हें अपने मूल्य का बोध कराए और तुम्हें भीतर से स्थिर बनाए—तो वह स्वाभिमान है। लेकिन वही उपलब्धि यदि शब्दों, व्यवहार और प्रदर्शन में इतनी बाहर आने लगे कि व्यक्ति हर अवसर पर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने लगे, तो वह अभिमान का रूप ले सकती है।
स्वाभिमान में मौन की शक्ति होती है। अभिमान को प्रमाण चाहिए। स्वाभिमान अपने निर्णयों के प्रति उत्तरदायी रहता है। अभिमान अपने निर्णयों के लिए दूसरों को दोष देने लगता है। स्वाभिमान कहता है— “मैं अपनी गरिमा जानता हूँ।” अभिमान कहता है— “तुम सबको मेरी गरिमा माननी ही होगी।”
आचार्य निखिल की इस गुरु-वाणी का आत्मिक संदेश इसलिए केवल विनम्र बनने का आग्रह नहीं, बल्कि आत्मबोध का निमंत्रण है। वे मानो कहते हैं— “अपने भीतर इतना प्रकाश रखो कि तुम्हें अपने उजाले का परिचय देने के लिए किसी दूसरे की आँखों में अपनी छवि खोजनी न पड़े। अपने कर्मों को बोलने दो। अपने व्यवहार को अपनी पहचान बनने दो। तुम्हें बार-बार यह बताने की आवश्यकता नहीं कि तुम कौन हो; तुम्हारा आचरण स्वयं बता देगा।”
अंततः मनुष्य को स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछना है— “मेरी उपलब्धियाँ मुझे भीतर से कितना बेहतर बना रही हैं और दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा सिद्ध करने की मेरी आवश्यकता कितनी बढ़ा रही है?” यदि उपलब्धि के साथ विनम्रता बढ़ रही है, तो वह जीवन की संपदा है। यदि उपलब्धि के साथ दूसरों को छोटा समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तो वहीं ठहरकर आत्मचिंतन आवश्यक है।
गुरुजी की वाणी मानो अंत में यही कहती है— “बंदे, इतना सक्षम बनो कि तुम्हें अपने सम्मान के लिए किसी को अपमानित न करना पड़े। इतना समृद्ध बनो कि तुम्हें अपने वैभव का प्रदर्शन न करना पड़े। इतना ज्ञानी बनो कि सीखने की विनम्रता बनी रहे। और इतना ऊँचा उठो कि तुम्हारी ऊँचाई तुम्हारे भीतर दिखाई दे, तुम्हारे शब्दों में नहीं छलके।”
स्वाभिमान मनुष्य की आंतरिक गरिमा है; अभिमान उसी गरिमा का अतिरेक है। एक व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है, दूसरा भीतर की शांति को धीरे-धीरे बाहर की स्वीकृति पर निर्भर कर सकता है। इसलिए अपने भीतर सम्मान को स्थान दीजिए, पर उसे अहंकार बनने से पहले पहचान लीजिए।
यदि चाहें तो इसी प्रवचन को आचार्य निखिल चिंतन पुस्तक के लिए और अधिक साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा संग्रहणीय शैली में भी परिष्कृत किया जा सकता है।
वक्ता










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