भूमिका
आओ! प्रति दिन को बना दें अवसर
हर्ष और उल्लास का
देखो तो कैसे रचा यह जाल प्रभु ने
अंतर्संबंध का कि
एक शिशु है आ रहा विदेश से भारत भू पर
तो रच दिया अभिनंदन गीत उसके नाम का।
देखिए! पढ़िए और आनंद लीजिए एक ऐसी रचना का जिसको जिसके लिए रचा गया उसका समग्र आनंद वह तो नहीं लेकिन उसके संबंधी और रिश्तेदार अवश्य ले पाएंगे, लेकिन भला हो ब्लॉगर साइट का कि प्रस्तुत शब्दों को वह शिशु कभी भी अबोध से बड़ा होने के बाद स्वयं भी पढ़ पाएगा।
आशीर्वादी मनोभाव
प्रिंस शिशु ऋषि के अपने घर (भारत) आगमन पर उसका आशीर्वाद सहित स्वागतआज विदेश से शिशु मनोहर ऋषि देखो अपने घर आया।
प्यार भरा आशीष सभी से आज स्वयं उसने है पाया।
बाबा ओंकार द्युलोकी सूक्ष्म रूप धार कर आए,
अर्जुन ऋषि पौत्र दोनों को आशीषों के बंडल लाए।।
दादी अम्मा मधु आज तो नवल पौत्र लखकर हर्षाई।
आशीषों की पावन बूंदें ऋषि पौत्र पर हैं बरसाईं।
हेमंत देवना मम्मी पापा देखो कितने हैं हर्षाए,
अर्जुन और ऋषि पुत्रों को फिरते अपने कंठ लगाये।।
बुआ वसुन्धरा विशाल संग में स्वयं ऋषि समभाव लिये है।
भैया विराट विहान स्वयं भी मोहक ऋषि को छांव दिये हैं।
देवेन्द्र - सिमरन नाना नानी की भी है एक चमक निराली,
आशीषों से भरी स्वयं की झोली ही खाली कर डाली।।
समर्थ अपर्णा मामा मामी आशीषों की गठरी लाए।
देख भान्जे के मुखड़े को दीख रहे कितने हर्षाए।
दून घाटी का ही ना केवल आशीष गाँव का भी पाया है,
गुड से मीठा प्यार उन्होंने नवल शिशु पर बरसाया है।।
बाबा दादी सुशील अर्चना ने भी शिशु पर हाथ धरा है।
बुआ गार्गी अंशी और माधव चाचा ने प्यार करा है।
सम्बन्धी जो आए दूर से उनका है आशीष मनोहर,
बाबा कृष्ण की यही कामना ऋषि पर कृपा बरसे ईश्वर।।
आशीर्वाददाता
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
निर्माण विहार, देहरादून
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें