शुभ कामनाओं से स्मृति नमन तक
बालसखा कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
और उलझन सुलझन मासिक
की ओर से
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं
परमप्रिय डॉ० देशराज सिंह 'राज' के जन्म दिवस दिनांक 6 जौलाई 2025 पर उनके बालसखा और मासिक पत्र उलझन सुलझन की ओर से हार्दिक शुभ कामनाएं निम्न के माध्यम से
बधाई पत्र का मजमून
जन्म दिवस पर तुम्हें राज मैं देता कृष्ण बधाई।
शत्याधिक वर्षी हो जीवन हरि से आस लगाई।
साधक हो तुम नेता जी के उनकी करी साधना।
नेता जी को तुमसे जाने जो भी चाहे जानना।
ज्ञान ध्यान के तुम पंडित हो रहा है सादा जीवन।
छल दम्भों से दूर रहा है सदा राज अन्तर्मन ।
कितनों पर उपकार किया है बनकर के उपकारी।
मानवता को पवित्र भावना तुम में बसती सारी ।
सुभारती में नेता जी की शोध पीठ रखवाले।
सुनकर भाषण सदा तुम्हारा हुए सभी मतवाले।
जीवन में संघर्षों से ही रहा तुम्हारा नाता।
सामाजिक पारिवारिक भैया भरी पड़ी है गाथा।
जो मिल लेता सदा तुम्हारे गुण फिरता वो गाता।
सदा तुम्हारा चेहरा देखा पीड़ा हर दिखलाता।
पर सेवा उपकार तुम्हारा जीवन अंग रहा है।
आदर्शी जीवन जीने का निर्मल ढंग रहा है।
क्रान्तिकारियों की लिख डाली कितनी तुमने पोथी।
बिखरे ही पन्नों पर रचना सदा तुम्हारी होती।
फिरो ढूँढते उन पन्नों को मन में तुम पछताते।
जिसको दे दी रचना छपने नहीं लौटकर आते।
कुछ तो ऐसे पाये करते रचना की जो चोरी।
चोरी तो चोरी होती है नहीं काली या गोरी।
तुमको कलियुग द्वापर वाला कृष्ण प्यार करता है।
अतुल कृष्ण भी सदा तुम्हारा अतुल मान करता है।
जन्मदिवस पर नवल स्वयं भी करता नवल कामना।
जीवन भर ही किसी कष्ट से होवे नहीं सामना।
पोते-पोती, पुत्र वधुओं संग गाते गीत तुम्हारे ।
प्यारे वे तुमको लगते हैं उनको तुम हो प्यारे ।
जीवन संगिनी को तुम हर पल पर्दे में रखते हो।
पत्नी सेवा भावों का तुम मान बहुत करते हो।
बैठे-बैठे सब कुछ मिलता ज्यों बिन माँगे मोती।
दोनों पोती इतनी प्यारी कोई न उपमा होती।
जन्मदिवस को आओ सब ही मिलकर खुशी मनायें।
जो पुस्तक नहीं छप पाई है उसको छपती पायें।
कृष्ण सखा की यही कामना छप जायें सारी रचनाएँ।
जो भी रचना पढ़े-सुने वो भाग्य सराहे अपना।
जो भी सपने शेष बचे हैं सारे पूरे होवें।
पूर्ण सभी ही सपने करके ईश्वर में मन खोवें।
शत्याधिक वर्षी हो जीवन कृष्ण पुनः ये कहता ।
राज-कृष्ण की जोड़ी हर कोई आदर्शी है कहता।
स्मृति के शिखर पर देशराज जी
जन्मदिवस की बधाई से स्मृति-नमन तक
६ जुलाई २०२५ को उलझन सुलझन परिवार की ओर से जब आदरणीय गुरु देशराज जी को जन्मदिवस का यह काव्यात्मक अभिनंदन-पत्र भेंट किया गया था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक वर्ष पूर्ण होने से पूर्व ही वे अपनी कर्मभूमि छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल पड़ेंगे।
उस दिन शब्दों में मंगलकामनाएँ थीं, आज उन्हीं शब्दों में स्मृतियों का उजास है। तब शतायु होने की प्रार्थना थी, आज उनके अमर व्यक्तित्व को प्रणाम है। तब उनके स्वस्थ, दीर्घ और सक्रिय जीवन की कामना थी, आज उनके द्वारा जिए गए प्रत्येक क्षण को युगों तक प्रेरणा देने वाली धरोहर के रूप में नमन है।
गुरु देशराज जी ने यह सिद्ध किया कि मनुष्य की आयु वर्षों से नहीं, बल्कि उसके पुरुषार्थ, कर्मठता, चिंतन और समाज के लिए किए गए समर्पण से मापी जाती है। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण ज्ञान-साधना, राष्ट्रचिंतन, सामाजिक जागरण और मानवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए समर्पित किया। उनके लिए लेखनी केवल शब्दों का माध्यम नहीं थी; वह समाज-निर्माण का संकल्प, इतिहास के संरक्षण का अभियान और आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतना का दीपक थी।
वे उन बिरले व्यक्तित्वों में थे जो सम्मान पाने के लिए नहीं, बल्कि सम्मानित मूल्यों को जीवित रखने के लिए जीते हैं। संघर्ष उनके जीवन का साथी था, पर उन्होंने कभी संघर्ष को शिकायत नहीं बनने दिया। उन्होंने कठिनाइयों को सीढ़ियाँ बनाया और पुरुषार्थ को अपना परिचय।
उनकी सादगी में असाधारण ऊँचाई थी। उनका ज्ञान विनम्रता से सुशोभित था। उनका व्यवहार आत्मीयता से भरा था और उनका जीवन इस सत्य का साक्षात् प्रमाण था कि महानता का वास्तविक स्वरूप पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और संस्कार होते हैं।
उन्होंने असंख्य लोगों को दिशा दी, अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया, इतिहास के बिखरे पृष्ठों को समेटा, क्रांतिकारियों के जीवन को शब्द दिए और समाज को यह विश्वास दिलाया कि यदि संकल्प अटल हो तो सीमित संसाधन भी असीम उपलब्धियों का आधार बन सकते हैं।
आज उनका भौतिक अस्तित्व हमारे बीच नहीं है, किंतु उनका चिंतन, उनका पुरुषार्थ, उनकी कर्मनिष्ठा और उनके द्वारा बोए गए संस्कार अनगिनत हृदयों में जीवित हैं। ऐसे व्यक्तित्व कभी विदा नहीं होते; वे अपने कार्यों में, अपने विचारों में और अपने द्वारा प्रेरित लोगों के जीवन में सदैव उपस्थित रहते हैं।
आज जब हम उस जन्मदिवस पर लिखी गई मंगलकामनाओं को पढ़ते हैं, तो वे केवल शुभकामनाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ बन जाती हैं—ऐसे महापुरुष के जीवन का, जिसने अपने हर श्वास को समाज और राष्ट्र के नाम कर दिया।
गुरु देशराज जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य का वास्तविक उत्तराधिकार उसकी संपत्ति नहीं, उसका चरित्र होता है; उसकी पहचान उसका पद नहीं, उसका पुरुषार्थ होता है; और उसकी अमरता उसके शरीर में नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए लोकमंगल के कार्यों में बसती है।
उलझन सुलझन परिवार आज अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है और संकल्प दोहराता है कि उनके अधूरे स्वप्न, उनके विचार और उनकी साहित्यिक-सामाजिक साधना को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
"व्यक्ति चला जाता है, पर उसका पुरुषार्थ समय के आकाश पर ध्रुवतारे की भाँति स्थिर रहता है। गुरु देशराज जी भी ऐसे ही ध्रुवतारे हैं, जिनका प्रकाश आने वाली पीढ़ियों का पथ सदैव आलोकित करता रहेगा।"
विनम्र श्रद्धांजलि।
शुभाकांक्षी
टीम उलझन सुलझन और
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
(उलझन-सुलझन के लिए राजीव के भावों के अनुसार)
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति







टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें