स्मरण योग्य तथ्य
भूमिका
जन्मदिवस केवल एक तिथि भर नहीं है, यह जीवन के अब तक के सफ़र का पड़ाव भी है जहाँ ठहरकर मनुष्य स्वयं से संवाद करता है। एक कवि की दृष्टि से यह दिन बीते हुए वर्षों की परछाइयों और आने वाले कल की रोशनियों के बीच का वह क्षण है, जब हम अपने अस्तित्व का आकलन करते हैं—क्या पाया, क्या खोया, और क्या अभी शेष है। यह भूमिका आत्ममंथन की प्रेरणा देती है कि जीवन केवल वर्षों की गिनती नहीं, बल्कि उन अनुभवों, संवेदनाओं और कर्मों की समृद्धि है जो हमें एक अर्थपूर्ण यात्रा में बदल देती है।
यह है अवसर सूक्ष्मावलोकन का
प्रिय राजीव 'नवल' के जन्मदिवस पर बधाई संदेश
तिथि ४ सितम्बर
काव्य रचना
'राजीव' पावन जन्मदिवस पर 'कृष्ण' का हृदय हर्षित!
देकर तुमको जन्म बधाई होती नहीं प्रसन्नता वर्णित।
सर्वोदय कालोनी के संग ही पूरा मेरठ आज झूमता।
चारों ओर आज राजीव के महकों का उल्लास फूटता।
लगता जैसे जीवन भर की उलझन सारी सुलझा ली हैं।
हर उलझन को राजीव जी ने निज कौशल से मुरझा दी है।
नवल-नवल से आदर्शों की, भरी नवलता छाई इनमें।
उलझन-सुलझन के लेखन की महा निपुणता पाई इनमें ।
पत्नी जी के गिले-शिकवे आज सभी छुमन्तर दिखते।
उनको तो बस पतिदेव के अन्दर राम रमे हैं दिखते।
पुत्री और दामाद संग ही नातिन नाना की प्यारी है।
पौत्री पुत्रवधु संग बेटे स्वयं 'नवल' पर बलिहारी हैं।
शत्याधिक वर्षी पा जीवन ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि पावे।
सामाजिक उपकार करे नित अधरों से हर पल मुस्काये।
'कृष्ण' तुम्हारा शुभचिन्तक है, 'नवल' 'कृष्ण' को भूल न जाना।
कभी न ईश्वर भी भूलेंगे तुम पर निज कृपा बरसाना।
इच्छा थी कि परिवार के जन-जन का मैं नाम पुकारूँ।
देकर निज आशीष सभी को हृदय से मैं उन्हें दुलारूँ।
किन्तु मन की रह गई मन में बता ना पाये नाम 'नवल' जी।
उनकी भी नहीं गलती कोई व्यस्त भयंकर सदा 'नवल' जी।
इन नामों में क्या रखा है सोच नवल की लगी लुभावन।
भाव अशीषी ही बरसेंगे सदा 'कृष्ण' के उन पर पावन।
मेरा है आशीष सभी को जन्मदिवस की खुशी मनाओ।
मिलजुल कर परिवार संग तुम अपने को मुस्काता पाओ।
स्नेह सदा ही स्वयं 'कृष्ण' का 'नवल' तुम्हारे ऊपर बरसा।
नवल-नवल सी बात नवल से, सदा कृष्ण का हृदय हरषा।
परिवार का जन-जन मिलकर ईश्वर भक्ति के गुण गावे।
जीवन में कोई भी संकट नहीं किसी के सम्मुख आवे।
कभी 'नवल' जी 'नवल' देश जा करें खेत घर की रखवाली।
मेरठ आएं तो दीवारों पर दीमक दिखलाती घरवाली।
इस कारण ही अपने कितने इनके कारज लम्बित होते।
दोष नहीं इनका गर कोई नवल वाणी से वंचित होते।
रिश्तेदारों - परिजनों के 'नवल' रहे हैं महा दुलारे।
सभी हितैषी इनके जितने लगे उन्हें ये प्यारे-प्यारे।
मूल रूप में मात-पिता से सदा सीख पाई थी पावन।
मात-पिता ने बन्धु सखा बन भर डाले संस्कार लुभावन।
पिता और चाचा ने मिलकर इनको बना दिया अनमोली।
उनकी ही पावन शिक्षा ने भर दी इनमें मीठी बोली।
अल्पायु में माता जी ने छोड़ दिया था इन्हें अकेला।
पिता और चाचा से पाया स्नेह सदा माँ-सा अलबेला!
बालेपन को सीखों में ही भरी चेतना नवल-नवल सी।
इसीलिए सदा भावना इनमें उपजी नवल-नवल सी।
जन्मदिवस पर स्नेह बधाई आशीषों की लगी झड़ी है।
इनके मन में निर्मल धारा गंगा जैसी बही बड़ी है।
बन्धु-सखा और परिवारीजन सभी आज दिखते हैं हर्षित।
जगह-जगह से मिली बधाई इनके मन को करती उल्लसित।
शत्याधिक वर्षी जीवन का मिला इन्हें आशीष 'कृष्ण' का।
इनके सर पर हाथ रहा है सदा-सदा भगवान 'कृष्ण का।
जन्मदिवस पर देवलोक से मात-पिता-चाचा सब आये।
रूप सूक्ष्म से ही लगता कि आशीषों के पुष्प गिराये।
'उलझन सुलझन' पेपर ने भी आज स्वयं ही लेख लिखे हैं।
पेपर में नूतन सन्देश शब्द-शब्द में आज दिखे हैं।
सदा खनकती हंसी नवल की खुशियों तक को है खनकाती।
मिशन चेतना ऐसा इनका सब में चेतनता जग जाती।
नवल नवल नित कर्म करो तुम और गगन नीले को छू लो।
शर्त यही पर नभ पर चढ़कर नहीं 'कृष्ण' को मन में भूलो।
रचनाकार
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
भूमिका रचना
प्रस्तुति


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