दोहे - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
भूमिका
सृष्टि में कुछेक लोग ही हैं जो जीवन साथी और उसकी महत्ता को इतनी गहराई से समझ पाते हैं जितनी गहराई से कविराज श्री कृष्णदत्त शर्मा ने समझा और रचनाओं पर रचना रच डालीं। भावों को समझना तो कोई उनसे सीखे।
दोहे
कृष्णा
(दिवंगत अर्धांगिनी के जन्मदिन 12-09-2025 पर विशेष)
'कृष्णा' याद तुम्हारी, आती है दिन-रात।
कभी-कभी तो नयन से बहती है बरसात।।
लिखता-पढ़ता रोज हूँ, खाता पीता रोज।
पर तुम बिन मुझको सदा, फीका लगता भोज।।
मन में रह जाती देवी, मेरे मन की बात।
सुनने वाला कौन है, जो सुन ले हर बात।।
कुछ लज्जावश किसी से कहूँ न मन की बात।
बात बसी मन में सदा, विरह देत दिन-रात।।
मृत्यु मात्र ही सत्य है, झूठा सब संसार।
सम्भव सब कुछ बदलना, अटल मृत्यु की धार।।
ज्ञानी हम इतने नहीं, मोह सभी दें त्याग।
हम साधारण मनुज हैं, गाते ममता राग।।
जब तुम मेरे पास थीं, साथ रहा था चैन।
मौन साध अब मन सदा, रहता है बेचैन।।
लिखने-पढ़ने में यहाँ समय रहा हूँ काट।
कभी नहिं तुम आओगी फिर भी देखूँ बाट।।
जानता मैं तुम्हारा वास बहुत है दूर।
मिलने में तुम हो विवश, मैं भी हूँ मजबूर।।
पता नहिं जहाँ रह रहीं कैसा रहता हाल।
क्या तुम भी बेचैन हो, वहाँ लिया क्या ढाल।।
बचपन से ले मृत्यु तक याद सभी हैं बात।
वो बातें मन में सजीं देतीं सुख दिन-रात।।
तुमको नभ में ढूँढने मन पंछी नित जाय।
मिलती ना दिखती वहाँ, मन लौटे मुरझाए।।
तुम बिन गीतों की यहाँ हुई बड़ी भरमार।
पर जिनमें तुम हो नहीं मुझको वो बेकार।।
नूतन लिखता गीत जब तुमको पाता पास।
तुम पढ़ती हो, मौन हो, ऐसा है विश्वास।।
बिना कलम के लिख रहा अपने मन की बात।
तुम उसको लिखवा रहीं, मेरी क्या मन।।
जीवन का इक सुनो सपना था अनमोल।
टूट गया वो बीच में गया विरह उर घोल।।
नयना मेरे बह रहे नहीं पाए हैं सूख।
बहते नयना की कभी मिट नहिं पाई भूख।।
भले बहें मेरे नयन होता नहीं हताश।
बहकर नयना नीर में तुम आ जातीं पास।।
ईश्वर से विनती यही, तुमको जाऊँ भूल।
चुभें न जिससे याद के प्यारे-प्यारे फूल।।
विनती करता ईश से करे मोह से दूर।
याद मात्र हो उसी की, रहूँ उसी में चूर।।
फिर भी नाम ये कृष्णा, हरि सा है संतोष।
इसीलिए नित ले रहा, दिखा न इसमें दोष।
रचनाकार
श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
प्रस्तुति
12-9-25

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