दर्द की भाषा
दर्द की भाषा
बहुत देर तक जंगल में भटकने के बाद कृष एक मनोरम स्थान पर पहुँचा। झरने की कल-कल उसके अंदर की थकान व शोर को शांत करने लगी। वह वहीं पर बैठ गया। तभी ऊपर चट्टान पर उसकी नजर गई जहाँ एक महिला आकृति नीचे की तरफ झुक रही थी। पता नहीं उसने क्या सोचा और तुरंत ही भागते हुए उस चट्टान पर जा पहुँचा। उसकी सांसों का शोर बढ़ गया था पर अकेलेपन की उदासी कुछ कम हो गई थी। नजदीक पहुँचकर उसने देखा वह कोई पहाड़ी औरत थी जिसकी आँखें उसे अपनी ही तरह की दिखी।
.... तुम यहाँ क्या कर रही हो....?
उसने कुछ कहना शुरू किया पर वह समझ नहीं पाया। वह रोते हुए आसमान की तरह देखकर कुछ कहने लगी जो उसकी भाषा नहीं थी। अंजान बोली उसके पल्ले नहीं पड़ी पर हाॅं इतना वह जरूर समझ गया कि वह भी उस दौर से गुजर रही है जिससे गुजरते हुए वह यहाँ तक पहुँचा है। वह काफी देर तक इधर-उधर इशारे कर उसे कुछ-कुछ बताती रही। वह उसे देखते रहा और खुद की पीड़ा को सुनता रहा। कभी-कभी अपनों से मिली पीड़ा हम किसी को बता नहीं पाते। जान से ज्यादा प्यारी पत्नी की बेवफाई के लिए उसके पास कोई शब्द नहीं थे। पीड़ा को कोई बिना कहे समझे यह हम चाहते हैं। बस उस वक्त यही होने लगा। वह पीड़ा जो इतने दिनों तक कृष के दिल में मूक चीख बनकर उसे तड़पा रही थी आज वह निनाद की तरह गूंजने लगी। उसने भी अपनी भाषा में कहना शुरू कर दिया। ऐसा करते ही उसे हल्कापन महसूस हुआ। इस क्रम को दोनों ने ही जारी रखा। कुछ घंटे के बाद दोनों ही खामोश हो गए। साथ ही हल्के भी। दर्द की भारी शिला जो दोनों के दिल पर थी पिघलकर बह चुकी थी। पहली बार लगा पीड़ा समझने के लिए किसी भाषा या शब्द की कोई जरूरत नहीं। पीर हमेशा गूंगी होती है जो हर अंग से गूंजते रहती है ।
मेरी आँखों की पीर की नदी
उसकी आँखों से जा मिली
भावनाएं दोनों की बिना
पतवार के बह चलीं
रचनाकार
विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन, महिला लेखिका इकाई
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति






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